शक्तिपीठों के सामयिक प्रभाव पर हुआ गहन मंथन

  • दो दिवसीय ’सर्वं शक्तिमयं’ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

  • देश-विदेश से जुटे 45 शोधकर्ताओं ने  शोध पत्रों का वाचन

  • प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद शर्मा त्रिपुरी सम्मान से सम्मानित

जबलपुर | त्रिपुरी शोध पीठ जबलपुर और महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट ऑफ हॉयर एजुकेशन  जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान में ’’वर्तमान परिदृश्य में शक्तिपीठों की भूमिका’’ विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। सम्मेलन का शुभारंभ महाराष्ट्र  कॉलेज के  ऑडिटोरियम में आचार्य शंकर संस्कृत एकता न्यास की आचार्य पूज्य स्वामिनी सद्विद्यानन्दा सरस्वतीएवं डॉ. जितेंद्र जामदार पूर्व उपाध्यक्ष जन अभियान परिषद मध्यप्रदेश शासन के मुख्य आतिथ्य में एवं सचिव महाराष्ट्र शिक्षण मण्डल श्री प्रमोद दिवाकर पाठक की अध्यक्षता में हुआ। विभिन्न विद्वानों डॉ. अखिलेश गुमास्ता, प्रोफेसर रजनीश शुक्ला संपूर्णानंद संस्कृत यूनिवर्सिटी वाराणसी, प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद शर्मा हेड ऑफ फिलॉस्फी डिपार्टमेंट राजस्थान यूनिवर्सिटी ने भारत में एवं भारत के बाहर बंग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान में स्थित विभिन्न शक्तिपीठों का वर्तमान परिदृश्य में समाज, परिवार, अर्थव्यवस्था एवं विभिन्न क्षेत्रों में क्या भूमिका है पर अपने विचार प्रस्तुत किये। द्वितीय दिवस पर इस विचारमंथन यज्ञ में जलगांव महाराष्ट्र से आये डॉ. विजय श्रीनाथ कांची, बनारस उत्तरप्रदेश से आये प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, प्रो. ब्रम्हानंद त्रिपाठी एवं अन्यान्य विद्वानों ने विभिन्न शास्त्रों में बताई गईं शक्तिपीठों का प्रभाव पर अपने उद्गार व्यक्त किये। अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन के संयोजक प्राचार्य डॉ. दिलीप सिंह हजारी ने सम्मेलन की कल्पना, रूपरेखा पर प्रकाश डाला। आयोजन सचिव डॉ. नितिन कुमार पटेल ने त्रिपुरी शोध पीठ के आयोमों पर व्यापक ढंग से प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन डॉ. त्रिपुरी शोध पीठ के संरक्षक श्री निरंद सिंह ठाकुर ’’नीर’’ ने किया एवं तकनीकी सत्रों का संचालन डॉ. राजा तिवारी एवं डॉ. अर्चना साने ने किया। इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से आये प्रतिभागियों ने शोधपत्र भी प्रस्तुत किये। अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का वर्चुअल मोड पर भी प्रसारण किया गया जिनमें त्रिभुवन यूनिवर्सिटी नेपाल से प्रो. गोविद शरण उपाध्याय एवं श्रीलंका से श्री पराक्रमा अभयगुणावर्धने एकानायके एवं विभिन्न विषय विशेषज्ञों तथा शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र पढ़े। अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में बड़ी संख्या में शोधार्थी, गणमान्य नागरिक, महाविद्यालयों के आचार्य एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।